दिल्ली : हाल ही में नैशनल न्यूज़ चैनल की एक पत्रकार फाये डिसूज़ा ने खुलासा किया है कि पेट्रोल को सरकार इन दिनों 65 से 70 रुपए प्रति लीटर के हिसाब से बेच रही है, लेकिन पेट्रोल की असल कीमत ज्यादा से ज्यादा 30 रुपए प्रति लीटर पड़ती है। इसमें पेट्रोल पंप डीलर की कमीशन व सभी अन्य टैक्स भी शामिल है। लेकिन सवाल यहां उठता है कि आखिर क्यों मोदी सरकार लोगों से फ़ालतू में इतना पैसा वसूल रही है।

एक बार बीजेपी की मोदी सरकार आने दो, फिर आएंगे भारत में अच्छे दिन। मोदी सरकार को आए 3 साल से ऊपर हो गए है, लेकिन देश की जनता ने अभी तक अच्छे दिन नहीं देखे। अच्छे दिन कैसे होते हैं, यह भारत को लोगों को देखे अरसा बीत गया। दुःख तो इस बात का है कि मोदी जी सबकुछ जानते हुए भी अपने ही देश की आम जनता को लूटने में लगे हुए हैं।

फायदा सरकार और तेल कंपनियों को

दरअसल, इस तेल के खेल में देश की जनता भले ही ऊंची कीमतों से परेशान हो रही है, लेकिन के कच्चे दामों में आई इस भारी गिरावट का असली फायदा सरकार और तेल कंपनियां उठाती हैं। इस समय हकीकत ये है कि फायदे की असल चांदी सरकार और तेल कंपनियां काट रही हैं। जो तेल जनता को आधी कीमत में मिलना चाहिए था उसे दोगुनी कीमत पर बेचा जा रहा है। अगर सिर्फ चंडीगढ़ को ही देखा जाए तो यहां पर पेट्रोल की कीमत तकरीबन 60 रुपये 57 पैसे है।

ज्यादा से ज्यादा 30 रुपए प्रति लीटर पड़ती है कॉस्ट

तेल कंपनियों को प्रोसेस के बाद एक लीटर पेट्रोल की कीमत तकरीबन 23.77 रुपये पड़ती है, जिसे कंपनियां डीलरों को 27.6 रुपये पैसे की दर से डीलरों को बेचती हैं और डीलर इसमें 2 रुपये 26 पैसे अपना मुनाफा जोड़ते हैं, लेकिन असल खेल यहां से होता है जब केंद्र सरकार इस एक लीटर पर 19 रुपये 6 पैसे एक्साइज टैक्स वसूलती हैं और उसके बाद राज्य सरकार वैट के जरिए तकरीबन 12 रुपये 10 पैसे की वसूली करती है यानी जो पेट्रोल महज 25 से 30 रुपये प्रति लीटर मिलना चाहिए वो तकरीबन दो गुने दाम पर बेचा जाता है।

तेल कंपनियों को दिया दाम तेह करना का काम

हमारे देश में तेल के दामों को लेकर हमेशा से ही सियासत होती रही है। एक वक्त था जब सरकारें तेल कंपनियों को सब्सिडी देती थी और वोट बैंक के चलते तेल की कीमतें तय होती थीं, लेकिन पिछली सरकारों ने ये कहते हुए दाम तय करने का हक तेल कंपनियों को दे दिया कि कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार के आधार पर तय होती हैं, लेकिन हकीकत ये है कि आज भी सरकारों की बिना इजाजत के तेल कंपनियों में पत्ता तक नहीं हिलता।