दरअसल एक शख्स ने दारुल उलूम के फतवा विभाग से 157756 में सवाल पूछा था कि उसकी शादी के लिए कई ऐसे प्रस्ताव आ रहे हैं जिनके परिवार का मुखिया बैंक में नौकरी करता है, जबकि बैंकिंग प्रणाली पूरी तरह सूद (ब्याज) पर आधारित है, जिसे इस्लाम में हराम करार दिया गया है. क्या इस तरह के किसी परिवार में शादी की जा सकती है?

इसके जवाब में कहा गया कि इस तरह के परिवार में शादी नहीं करनी चाहिए जो हराम की कमाई कर रहे हों. इसके विपरीत किसी नेक घर में रिश्ता तलाशना चाहिए. बता दें कि इस्लाम धर्म में रुपये से आने वाला ब्याज रीबा कहलाता है. शरीयत में ब्याज पर पैसा लेने और देने को हराम करार दिया गया है.

इस्लाम के मुताबिक, धन का अपना कोई स्वाभाविक मूल्य नहीं होता, इसलिए उसे लाभ के लिए रहन पर दिया या लिया नहीं जा सकता. इसका केवल शरीयत के हिसाब से ही इस्तेमाल किया जा सकता है.

ध्यान रहे 8 वर्ष पूर्व भी दारुल उलूम देवबंद ने ब्याज पर आधारित देश की बैंकिंग प्रणाली से संबंधित एक फतवा जारी किया था. फतवे में दारुल उलूम ने बैंकिंग सेक्टर में मुसलमानों के नौकरी करने को नाजायज करार दिया था