मध्‍यप्रदेश : सीहोर जिले से बनने वाली पहली आइएएस अधिकारी होगी । 92 वीं रैंक के साथ उसका सिलेक्‍शन हुआ है । मगर सबसे महत्‍वपूर्ण है उसके आइएएस बनने की कहानी एक साधारण या बल्कि कहें कि निम्‍न मध्‍यमवर्गीय परिवार से निकली ये लड़की आइएएस में चयनित हो गई है । अनारक्षित वर्ग से निकली ये लड़की संघर्ष और हौसलों की एक अनोखी कहानी है ।

सोमवार का दिन एक गहरे अवसाद के साथ प्रारंभ हुआ मेरे लिये । और उस अवसाद का कारण था किसी जगह पर की गई मेरे बारे में एक बहुत ही अशालीन और दुखी कर देने वाली  टिप्‍पणी को पढ़कर । यूं तो पिछले कई दिनों से मुझे लग रहा था कि मुझे लेकर कई लोग असहज नहीं हैं । एक दो जगहों पर अप्रत्‍यक्ष रूप से मुझे नीचा दिखाने का प्रयास किया गया । किन्‍तु सोमवार को तो बस । ब्‍लागिंग समाप्‍त करने की पोस्‍ट अंतिम  लिख रहा था कि बिजली चली गई । अधूरी पोस्‍ट रह गई और उसी बीच आ गया गौतम का फोन जिसने अवसाद का हटा दिया । और फिर कुछ ही देर बाद आया श्री आलोक श्रीवास्‍तव जी का फोन । काफी लम्‍बे समय तक उनसे बात हुई । और कई बातें उन्‍होंने ऐसी कहीं कि अवसाद लगभग घुल गया ।

 

चलिये वो सब बातें छोड़ें जो बीत गई वो बात गई । आज तरही होना था लेकिन आज आपको प्रीति मैथिल की कहानी सुनाने की इच्‍छा है । प्रीति जो मेरे जिले की पहली आईएएस बनने जा रही है । कहानी सुनाना इसलिये जरूरी है कि उसकी कहानी में वो सब कुछ है जो एक विजेता की कहानी में होता है । प्रीति के पिता स्‍थानीय शुगर फैक्‍ट्री में श्रमिक थे । लगभग दस साल पहले अच्‍छी चलती हुई ये फैक्‍ट्री राजनैतिक महात्‍वाकांक्षा की भेंट चढ़ी और बंद कर दी गई । उसीके साथ हजारों लोगों के भविष्‍य पर भी ताला लग गया । कई आत्‍महत्‍याएं हुईं बहुत कुछ हुआ और एक आंदोलन भी प्रारंभ हुआ जो आज तक भूख हड़ताल के रूप में चल रहा है शायद ये इंतिहास की सबसे लम्‍बी हड़ताल है जो दस सालों से सीहोर के कलेक्‍ट्रेट के सामने चल रही है । जब मिल बंद हुई तो प्रीति का परिवार भी सड़क पर आ गया । और प्रारंभ हुआ संघर्ष का दौर । तब प्रीति 13 साल की थी और परिवार का संघर्ष उसने आंखों से देखा । पिता ने एक छोटे से जमीन के टुकड़े  पर किसानी प्रारंभ की  और परिवार को पाला । जमीन का टुकड़ा जो स्‍वयं का भी नहीं था और इतना भी नहीं था कि उससे एक परिवार का पालन हो । शुगर मिल के बंद होने में कलेक्‍टरों की भूमिका को देख कर सब आक्रोशित थे और यही आक्रोश था प्रीति के मन में भी । उसने घर की भीषण तंग स्थिति में भी निर्णय लिया कि मैं आईएएस बनूंगी । गरीब परिवार, पिछड़ा इलाका और अनारक्षित वर्ग की एक साधारण सी लड़की ने वो सोचा जो उन परिस्थितियों में कोई भी नहीं सोचता । मगर कहते हैं ने उड़ान पंखों से नहीं हौसलों से होती है । और उस छोटी सी गुडि़या ने वो सच कर दिखाया । पिछले दिनों आइएएस में उसका 92 वी रैंक के साथ चयन हुआ है । जब मैं इलेक्‍ट्रानिक मीडिया के लिये उसके घर साक्षात्‍कार के लिये पहुंचा तो उसका घर देख कर मुझे लगा कि हां होते हैं लाल भी गुदड़ी में । मेरा सलाम प्रीति को ।

 

जब श्रमिकों की ओर से एक मंडल मुझसे लिने आया कि वे प्रीति का सम्‍मान करना चाह रहे हैं और मैं उस कार्यक्रम का संचालन करूं तो सबसे पहले तो अपनी कसम याद आई कि गैर साहित्यिक कार्यक्रमों का संचालन नहीं करना । खैर जब पता चला कि भवन निर्माण का  काम करने वाले मजदूर ये सम्‍मान चौराहे पर कर रहे हैं तो बिना कुछ सोचे हां कर दी । कार्यक्रम सुबह आठ बजे था जब मजदूर काम की तलाश में चौराहे पर आते हैं । फूलों का वर्षा के बीच प्रीति का सम्‍मान किया गया । कार्यक्रम के बाद मैं एक तरफ जाकर श्री रमेश हठीला के साथ खड़ा हो गया । चैनल वाले प्रीति का इंटरव्‍यू करने लगे  । प्रीति से मेरा कोई पूर्व परिचय नहीं था । अचानक वो मुझे ढूंढते हुए आई और बोली ‘ मैं आपकी बहुत बड़ी फैन हूं आपकी सारी कहानियां मैंने पढ़ी हैं ” । प्रीति की उस एक वाक्‍य ने सोमवार की सुबह का सारा अवसाद धो दिया । और मैं फिर ये तैयार हो गया । संन्‍यास का इरादा फिलहाल कैंसिल धन्‍यवाद गौतम, धन्‍यवाद आलोक जी , धन्‍यवाद प्रीति ।  ये कहानी इस उम्‍मीद के साथ कि इसको अपने बच्‍चों को जरूर पढ़ायें ।