डेस्क : रक्षाबंधन पर रानी कर्णावती का जिक्र ना हो, ये संभव नहीं. कर्णावती ऐसी महान राजपूत रानी थी, जिन्‍होंने जौहर में जान दे दी, पर घुटने नहीं टेके.

जानिए कौन थी कर्णावती, जिसने भाई की राह तकते-तकते जान दे दी

रक्षाबंधन पर रानी कर्णावती का जिक्र ना हो, ये संभव नहीं. कर्णावती ऐसी महान राजपूत रानी थी, जिन्‍होंने जौहर में जान दे दी, पर घुटने नहीं टेके. दरअसल, चित्तौड़ के शासक महाराणा विक्रमादित्य को कमजोर समझकर गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह ने राज्‍य पर आक्रमण कर दिया था. इस मुसीबत से निपटने के लिए कर्णावती ने सेठ पद्मशाह के हाथों हुमायूं को राखी भेजी थी.

क्‍या दिया था संदेश

राखी के साथ कर्णावती ने एक संदेश भी भेजा था. उन्‍होंने सहायता का अनुरोध करते कहा था कि मैं आपको भाई मानकर ये राखी भेज रही हूं.

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क्‍यों देर से पहुंची राखी

दरअसल, उन दिनों हुमायूं का पड़ाव ग्वालियर में था, इसलिए उसके पास राखी देर से पहुंची थी. जब तक वे फौज लेकर चित्तौड़ पहुंचे थे, वहां बहादुरशाह की जीत और रानी कर्णावती का जौहर हो चुका था.

हुमायूं की तैयारी

राखी मिलते ही हुमायूं ने वहां से आगरा और दिल्ली संदेश भेजा और फौजें जुटाने का आदेश दिया. लेकिन जब तक वह फौजों को लेकर चित्तौड़ पहुंचा, देर हो चुकी थी. कर्णावती महल की सभी स्त्रियों के साथ जौहर कर चुकी थीं ।

कौन थी रानी कर्णावती

मार्च 1534 में गुजरात के शासक बहादुर शाह ने चितौड़ के नाराज सामंतो के कहने पर चितौड़ पर हमला किया था. राणा सांगा की पत्नी राजमाता कर्णावती को जब ये पता चला तो वे चिंतित हो गईं. उन्‍हें पता था कि उनके राज्‍य की रक्षा केवल हूमायूं कर सकता है. इसलिए मेवाड़ की लाज बचाने के लिए उन्होने मुगल साम्राट हुमायूं को राखी भेजी और सहायाता मांगी. हुमायूं ने राखी का मान रखा. राखी मिलते ही उसने ढेरों उपहार भेजें और आश्वस्त किया कि वह सहायता के लिए आएगा.